शैव धर्म & वैष्णव धर्म (भागवत धर्म) की जानकारी 😱😱 #truthoflife

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 शैव धर्म


➤ शिव भक्ति के विषय में प्रारम्भिक जानकारी सिन्धु घाटी से प्राप्त होती है ।

भगवान शिव की पूजा करने वालों को शैव एवं शिव से सम्बन्धित धर्म को शैव धर्म कहा गया है।


➤  मेगस्थनीज ने चौथी शताब्दी ई. पू. में शैवमत का उल्लेख किया है। 

शैव सम्प्रदाय को लकुलीश, पाशुपत अथवा महेश्वर कहा जाता है। 

लिंग पूजा का प्रथम स्पष्ट उल्लेख मत्स्य पुराण में मिलता है।

शैव सम्प्रदायों का प्रथम उल्लेख पतंजलि के 'महाभाष्य' में शिव भागवत नाम से हुआ ।

वामन पुराण में शैव सम्प्रदाय की संख्या चार बताई गई है, ये हैं— (1) शैव, (2) पाशुपत, (3) कापालिक, (4) कालामुख |

शैव इस सम्प्रदाय के अनुसार कर्त्ता शिव हैं, कारण शक्ति और उपादान बिन्दु हैं।

पाशुपत यह शैव मत का सबसे पुराना सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय के संस्थापक लकुलीश या नकुलीश थे जिन्हें भगवान शिव के 18 अवतारों में से एक माना जाता है।

कापालिक कापालिकों के इष्टदेव भैरव थे जो शंकर का अवतार माने जाते हैं।

कालामुख इस सम्प्रदाय के अनुयायियों को शिव पुराण में महाव्रतधर कहा गया है। ये नर-कपाल में ही भोजन, जल तथा सुरापान करते हैं और साथ ही अपने शरीर पर चिता की भस्म मलते हैं

लिंगायत सम्प्रदाय दक्षिण भारत (कर्नाटक) में भी शैव धर्म का विस्तार हुआ। इस धर्म के उपासक दक्षिण भारत में लिंगायत या जंगम कहे जाते थे ।

बसव पुराण में इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक अल्लभप्रभु एवं उनके शिष्य बसव का उल्लेख मिलता है। इस सम्प्रदाय को वीरशिव सम्प्रदाय भी कहा जाता है।

दक्षिण भारत में शैव धर्म का प्रचार नयनार या आडियार सन्तों द्वारा किया गया, ये संख्या में 63 थे। इनके श्लोकों के संग्रह को 'तिरुमुडै' कहा जाता है जिसका संकलन 'नम्बि- अण्डला- नम्बि' ने किया।


वैष्णव धर्म (भागवत धर्म)

वैष्णव धर्म के विषय में प्रारम्भिक जानकारी उपनिषदों से मिलती है। भागवत धर्म से ही इस धर्म का विकास छठी शताब्दी ई. पू. के लगभग हुआ ।

छान्दोग्य उपनिषद् में श्रीकृष्ण का उल्लेख सर्वप्रथम मिलता है। उसमें श्रीकृष्ण को देवकी पुत्र ऋषि घोर अंगिरस का शिष्य बताया गया है। 

वैष्णव या भागवत धर्म के संस्थापक वासुदेव कृष्ण थे। वासुदेव कृष्ण के भक्त या उपासक भागवत कहलाते थे।

विष्णु के अधिकतम अवतारों की संख्या 24 है परन्तु मत्स्य पुराण में इनके दस अवतारों का जिक्र मिलता है। ये 10 अवतार हैं— मत्स्य, कूर्म (कच्छप), वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध और ल्कि (कलि)

एक मानवीय नायक के रूप में वासुदेव के दैवीकरण का सबसे प्राचीन (सर्वप्रथम) उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी से प्राप्त होता है।

अवतारवाद का सर्वप्रथम स्पष्ट उल्लेख तथा भागवत धर्म का सिद्धान्त भगवद्गीता में मिलता है।

यूनानी राजदूत तक्षशिला निवासी होलिओदोरस ने गरुड़ स्तम्भ स्थापित कराया। पहली सदी ई. पू. के नानाघाट अभिलेख से संकर्षण (बलराम) एवं .पू. वासुदेव का विवरण मिलता है।

दक्षिण भारत में वैष्णव धर्म का प्रचार वेंगी के पूर्वी चालुक्य एवं राष्ट्रकूटों के समय में हुआ। राष्ट्रकूट नरेश दन्तिदुर्ग द्वारा स्थापित एलोरा में दशावतार का मन्दिर काफी प्रसिद्ध है।

➤ विष्णु के अवतारों में वराह अवतार सर्वाधिक लोकप्रिय था । वराह का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में है।

नारायण का प्रथम उल्लेख 'शतपथ ब्राह्मण में मिलता है ।

दक्षिण के भक्ति आन्दोलन में तिरुमंगाई, पेरिय अलवार, स्त्री सन्त अण्डाल तथा नाम्मालवार के नाम उल्लेखनीय हैं।

➤ केरल का सन्त राजा कुलशेखर विष्णु का भक्त था।

वमन की उपासना प्रदेश के अलवारों में चिरकाल तक होती रही। वे वराह की भी उपासना करते थे।

असम कूच बिहार में वैष्णव धर्म का प्रवर्तन शंकरदेव ने किया। 'वेसनगर अभिलेख' का हेलियोडोरस तक्षशिला का निवासी था । 

यह भागवत धर्म का ज्ञात सर्वप्रथम उल्लेखनीय साक्ष्य है।


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